ग्रामीण महिलाओं ने बना डाले विश्वस्तरीय जरी आयटम

प्रदेश की जरी कला को जिंदा रखने किए जा रहे प्रयास

भोपाल: चंद दिनों पहले उन्हें न तो अपने प्रदेश और शहर की इस खास कला के बारे में जानकारी थी और न ही इस काम के विश्व में खास मुकाम रखने के बारे में मालूमात। लेकिन सही दिशा में उठाया कदम और समय पर मिला उचित मार्गदर्शन आज उन्हें विश्वस्तरीय प्रोडक्ट तैयार करने के लायक बना चुका है। उनके हाथों तैयार किए गए विभिन्न सजावटी और जरूरत के आयटम्स को देखकर यह कहना मुश्किल होगा कि यह सब उन ग्रामीण महिलाओं ने तैयार किया है, जो इस खास कला के बारे में शून्य हुआ करती थीं।

वैसे तो सांची का नाम विश्व प्रसिद्ध बौद्ध गुफाओं के साथ जुड़ा है। लेकिन अब इसकी एक खास पहचान यहां तैयार किए जा रहे प्रदेश की राजधानी भोपाल के मशहूर शिल्प जरी-जरदौजी प्रोडक्ट से भी की जाएगी। पहाड़ों, गुफाओं, हरियाली और खुली हवा के बीच यहां पिछले एक माह से जरी-जरदौजी वर्क की एक विशेष प्रोडक्ट डेवलपमेंट वर्कशॉप चलाई जा रही है।

मास्टर ट्रेनर हुमा खान (स्टेट अवार्डी : जरी-जरदौजी) द्वारा करीब ढ़ाई दर्जन महिलाओं और किशोरियों को यह प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण से पहले पूरी तरह से कोरे कागज की तरह इन प्रशिक्षणार्थियों ने एक माह की वर्कशॉप में इतना परफेक्शन हासिल कर लिया है कि अब वे दुनियाभर में पसंद किए जाने वाले जरी वर्क के विभिन्न आयटम्स तैयार करने लगी हैं। इन्होंनें इस प्रशिक्षण के दौरान लेडीस सूट और साड़ियों पर जरी वर्क करने पर महारत हासिल कर ली है। साथ ही अपने हुनर और मेहनत से इन्होंने भोपाली बटुए, टी कोस्टर, मोबाइल कवर जैसे कई मनभावन आयटम तैयार किए हैं।

हुमा खान कहती हैं कि उत्साह और लगन से कोई भी काम किया जाए तो उसके नतीजे बेहतर ही आते हैं। प्रशिक्षण के दौरान आने वाली महिलाओं में कुछ गृहिणी हैं तो कुछ विभिन्न कक्षाओं की छात्राएं। इन्होंने अल्प समय की वर्कशॉप में काम की बारीकी को देखा, सीखा और इसमें पारंगत भी हो गई हैं। वे बताती हैं कि केन्द्र सरकार के वस्त्र मंत्रालय द्वारा चलाए जा रहे इस खास प्रशिक्षण कार्यक्रम को भोपाल के एनजीओ ज्ञानपथ शिक्षा एवं समाज कल्याण समिति द्वारा संचालित किया जा रहा है। हुमा खान ने बताया कि दुनियाभर में पसंद की जाने वाली जरी कला को अब एक नए कलेवर में पेश करने की कोशिश चल पड़ी है। जिसके बेहतर परिणाम दिखाई देने लगे हैं। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं और एनजीओ के उचित मार्गदर्शन और मेहनत से यह स्थितियां बनती नजर आ रही हैं, उम्मीद की जा सकती है कि यह कला एक बार फिर अपनी प्रसिद्धि का परचम दुनियाभर में फहराएगी।

प्रशिक्षण लेने के लिए पहुंचने वाली छात्राओं ने इस कार्यक्रम को बेहतर और उपयोगी बताया। उनका कहना है कि इस तरह के प्रशिक्षण ने उन्हें एक नई दिशा दी है, जिसके सहारे वे अपने रोजगार के नए रास्ते तलाश सकती हैं। प्रशिक्षण के दौरान मिले ज्ञान को वे अपने जीविकोपार्जन का जरिया बनाने की नीयत रखती हैं। साथ ही इस काम को और गहराई तक सीखने की ललक के साथ ऐसे प्रशिक्षण सतत जारी रहने की उम्मीद भी करती हैं।

एनजीओ ज्ञानपथ के संचालक ईश्वर सिंह चौहान ने बताया कि वे लंबे समय से जरी-जरदौजी शिल्प को नए आयाम देने के लिए प्रयासरत हैं। अब तक कई प्रशिक्षणों के बाद मिले प्रतिसाद को वे आत्मा की संतुष्टि मानते हैं। उनका कहना है कि दम तोड़ रही इस जरी शिल्प को वे पुर्नजीवित करने के प्रयास कर रहे हैं। प्रशिक्षणों के माध्यम से कुशल और निपुण हो चुकीं महिलाओं को उचित प्लेटफार्म देने के भी उनके प्रयास जारी हैं।


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